Wednesday, August 27, 2014

क्यूँ एक और ब्लॉग ?

आधी-तिहाई गुज़र चुकी ज़िन्दगी के कुछ पल अनमोल थे। उनमें से कुछ यादगार पलों को यहाँ सहेजा संजोगा है। इसमें से सब कुछ खुद का या खुद पर भोगा हुआ नहीं है, लेकिन एहसास की शिद्दत कुछ कुछ वैसी ही है।

जब झा-भाई ने 'पिया-निमंत्रण' माँगा तब यह भावना  और भी प्रबल हुई की अपने कुछ चुनिंदा प्रयासों को समेटना शुरू किया जाए।  इनके स्रष्टा होने का भ्रम नहीं है, लेकिन इनके द्रष्टा होने का गर्व है मुझे।

जो मैं था और जो संभावनाएं मेरे सामने थीं, और जो मैं अब हूँ और जो दरवाज़े मैं किंचित बंद कर चुका हूँ, इन दोनों के बीच की खाई गहरी तो है, किन्तु उसके आस पास का दृश्य मनोरम भी है।

इनको बार बार पढ़ना एक मधुर-तिक्त अनुभव है।  मुझे दोनों स्वादों से प्यार है।

पश्चलेख: कहीं पढ़ा था की अपनी पुस्तक की समीक्षा स्वयं लिखना खुद की अंत्येष्टि करने जैसा है। पता नहीं हर रचना की भूमिका लिखने जैसे काम को क्या कहा जाए… 

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