Friday, August 29, 2014

पिया-निमंत्रण

कदाचित भ्रामक शीर्षक वाली यह कविता वास्तव में पिता को सम्बोधित है। पिता-पुत्री संबंध के बारे में अभी तक जितना भी लिखा-कहा गया है, कम है। बल्कि बहुत हद तक पिता का अपनी संतति के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों, चरणों में योगदान भुला-सा दिया जाता है और एक तरह से माताओं ने समस्त भावना जगत पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है। अपने समाज और साहित्य के इस मातृसत्तात्मक पक्ष ने कई बार क्षोभित किया है मुझे।

अगर याददाश्त धोखा नहीं दे रही है तो तारीख़ थी ११ दिसंबर सन २०००।  दीदी* की शादी में हम कुछ लोग अलाव के इर्द गिर्द बैठे थे। बातों बातों में यह महसूस हुआ की अभी भी भारतीय समाज में शादी कितनी बड़ी घटना होती है, ख़ासकर लड़की लिए।  किसी की बहन / बेटी  पलक झपकते ही किसी की मामी / चाची, बहू / भाभी  और पत्नी बन जाती है। और इन सब में पत्नी का रिश्ता कुछ हद तक एक उपक्रम सा लगता है, बाकी सब रिश्तों की स्थापना के लिए।

ये सब नये रिश्ते अपने साथ कुछ बंधन भी लेकर आते हैं जो लड़की के मन में श्रद्धा और भय दोनों का संचार करते हैं। कच्ची उम्र के उन कठिन पलों में लड़की के कोमल मन पर क्या गुजरती होगी ये ठीक ठीक जान पाना तो संभव नहीं है, किन्तु पुरूष की सीमित दृष्टि से जितना समझ पाया था उतना काग़ज़ पर उतार दिया। वनवास का चौदहवाँ साल शुरू हो गया है पर इस कविता की जगह कोई और नहीं ले पाई है। कदाचित संभव भी नहीं है।


* उम्र में बड़ी ममेरी / चचेरी / फुफेरी / मौसेरी बहनों को हमारे यहाँ दीदी ही बुलाते हैं। अँगरेज़ी का 'cousin' शब्द इस रिश्ते का अवमूल्यन अभी नहीं कर पाया  है।

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पिया-निमंत्रण
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बाबुल, पिया निमंत्रण आज!

बचपन जाता मुझे निहारे 
यौवन आता बाँह पसारे 
तन तुलसी, मन चंदन आज

बाबुल, पिया निमंत्रण आज!

आशा, शंका सखी बनी हैं 
श्रद्धा भय में पगी सनी है 
सौ रिश्ते, सौ बंधन आज

बाबुल, पिया निमंत्रण आज!

गोद तुम्हारी छूट रही है
क्यों दुनिया की रीत यही है?
करता है उर क्रंदन आज

बाबुल, पिया निमंत्रण आज!
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2 comments:

  1. Thanks for posting. Reading it again and again. Wonderful lines! Straight from the heart!

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  2. धन्यवाद। आपके अनुरोध को आदेश समझकर उसका पालन किया है। इसी बहाने शायद कुछ और पन्नों पर से भी धूल हटे। उत्साहवर्धन के लिए पुनः धन्यवाद।

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